मोदी है तो मुमकिन है
मोदी है तो मुमकिन है
मोदी है तो मुमकिन है
मोदी है तो मुमकिन है

भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े त्यौहार। आम चुनाव 2019 का एलान हो चुका है। लोकसभा चुनाव 2019 का शंखनाद होते ही। सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपनी चुनावी रणनीति को क्रियान्वित करना शुरू कर दिया है। सत्ता समर के इस उद्घोष के साथ ही चुनावी प्रचार-प्रसार चालू हो चुका है। मैदान में जाने वाले योद्धाओं के नाम की घोषणा चल रही है। कुछ ही दिनों में पहले चरण के नामांकन पत्रों का दाख़िला शुरू हो जायेगा। मगर चुनावी नारों की बात करें। तो अब तक सत्तासीन पार्टी भाजपा के आगे। बाकी दल चाय कम पानी नज़र आ रहे हैं। मुख्य रूप से प्रमुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस की हालत इस मामले में पिछड़े वर्ग सी है। जहाँ एक तरफ़ भारतीय जनता पार्टी “मोदी है तो मुमकिन है”। “फिर एक बार मोदी सरकार” के साथ मैदान में है। वहीँ दूसरी ओर कांग्रेस के गलियारे में इसे लेकर ख़ामोशी छायी हुई है।

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कांग्रेस के पास नहीं है “मोदी है तो मुमकिन है” का जवाब

लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान राहुल गांधी
लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान राहुल गांधी

भाजपा और मोदी सरकार के तमाम नेता गाजे-बाजे के साथ। “मोदी है तो मुमकिन है” उद्घोष के साथ चुनावी अभियान में लगे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं इस नारे के साथ चुनावी ताल ठोक रहे हैं। लेकिन कांग्रेस इसके आगे कमज़ोर और असहाय नज़र आ रही है। कांग्रेस के आला कमान और पार्टी ख़ुद “मोदी है तो मुमकिन है” के साथ-साथ मोदी सरकार और बीजेपी पर हमलावर हैं। लेकिन उनकी भूमिका सिर्फ़ बीजेपी के नारे पर उछलने तक ही सीमित है। चुनावी कार्यक्रम घोषणा में पता चला की मतगणना 23 मई को होगी। तो कांग्रेस के कुछ नेताओं ने “23 मई-बीजेपी गई” नारे को हैशटैग के साथ ट्वीट किया। मगर उसे कांग्रेस का औपचारिक नारा नहीं माना जा सकता। बल्कि भाजपा ने तो इसके जवाब में तुरंत “23 मई, कांग्रेस गई” नारा दे दिया। जिससे कांग्रेस की बोलती फिर से बंद हो गयी।

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“मोदी है तो मुमकिन है” के आगे सपा-बसपा का भी बेदम

बसपा अध्यक्ष मायावती व सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव
बसपा अध्यक्ष मायावती व सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव

भाजपा के “मोदी है तो मुमकिन है” नारे के आगे। न केवल कांग्रेस, बल्कि अन्य क्षेत्रीय पार्टियां भी कोई मज़बूत नारा नहीं ला पा रही हैं। जिस समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में “काम बोलता है” और “यूपी को साथ पसंद है” जैसे नारे दिए थे। अब लोकसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन में है। सपा के राष्ट्रिय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ट्वीट किया। “एक भी वोट न बंटने पाए, एक भी वोट न घटने पाए”। स्पष्ट होता है कि सपा अध्यक्ष अपनी पार्टी समेत बसपा और आरएलडी के समर्थकों से भी अपील रहे हैं। कि वो गठबंधन के हिसाब से ही मतदान करें। लेकिन फिर भी, कोई राजनीतिक पार्टी। भाजपा के आगे टिकती हुई नज़र नहीं आ रही है। शायद इसी डर से ही बसपा सुप्रीमों बहन कु. मायावती ने तो 2019 लोकसभा चुनाव लड़ने से ही मना कर दिया है।

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नकारात्मक चुनावी अभियान चलाकर फंसी कांग्रेस

राहुल गांधी ने जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स बताया
राहुल गांधी ने जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स बताया

गुजरात विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का “विकास पागल हो गया है” काफ़ी चर्चित हुआ। ऐसे ही जीएसटी को “गब्बर सिंह टैक्स” बताना भी ख़ूब चर्चा में रहा। इस बार राफेल सौदे को लेकर माननीय श्री राहुल गांधी। अपनी प्रत्येक जनसभा के मंच से “चौकीदार चोर है” का नारा खुलेआम लगवा रहे हैं। लेकिन ये तमाम नारे नकारात्मक चुनावी अभियान माने जाएंगे। कांग्रेस पार्टी को अपना एजेंडा हिंदुस्तान की जनता के सामने रखने के लिए एक अच्छे नारे की ज़रूरत है। जो कांग्रेस के पास अभी तक तो नहीं है। और शायद ही कांग्रेस कोई नया नारा लेकर आये। अभी तक जो देखा गया है। उसके अनुसार तो कांग्रेस, भाजपा के नारों को ही तोड़ मरोड़ कर काम में लेती आयी है। जिनमें मुख्य रूप से “अबकी बार कांग्रेस सरकार”, “मेरा बूथ मेरा गौरव” के साथ। राजस्थान विधानसभा चुनाव अभियान। “अब बदलेगा राजस्थान” भाजपा के चुनावी नारों से प्रेरित थे।

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कई बार सिर्फ़ चुनावी नारों ने ही सरकार बनायीं और बदली है

इंदिरा गांधी ने "ग़रीबी हटाओ" का नारा दिया
इंदिरा गांधी ने “ग़रीबी हटाओ” का नारा दिया

हिंदुस्तान के राजनीतिक इतिहास में अनेकों क्रांतिकारी चुनावी नारे दिए गए। जिन्होंने देश की राजनीति ही नहीं। अपितु देश के विकास की दशा और दिशा दोनों तय करने में अहम भूमिका निभाई। 1971 में इंदिरा गांधी ने “ग़रीबी हटाओ” का नारा दिया। तो इस नारे ने देश की ग़रीब आबादी में आशा की एक नयी किरण जगायी। इंदिरा को चुनाव में भारी बहुमत मिला। फिर इंदिरा गांधी ने 1975 में आपातकाल लगा। ग़रीबों को भी हटवा दिया था। लेकिन 1977 में “इंदिरा हटाओ, देश बचाओ” और “संपूर्ण क्रांति” जैसे विरोधी नारों के बावज़ूद कांग्रेस को एक तरफ़ा जीत मिली। इन सब के आलावा कांग्रेस नेता लाल बहादुर शास्त्री ने “जय जवान, जय किसान” एवं भाजपा नेता अटल बिहारी बाजपेयी ने “सबको देखा बारी-बारी, अबकी बारी अटल बिहारी” जैसे नारों के दम पर चुनाव लड़ा। और सरकार बनाने में क़ामयाब भी रहे।

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भाजपा “मोदी है तो मुमकिन है” को लेकर “फिर एक बार मोदी सरकार” बनाने को तैयार है

राजस्थान लोकसभा चुनावइसके बाद तो चुनावी नारे, चुनावी प्रथा बन गए। 2014 के आम चुनावों में भाजपा ने नरेंद्र मोदी को लक्ष्य बनाते हुए। “अबकी बार, मोदी सरकार” नारा दिया था। जिसके बाद पूरे देश में मोदी लहर चल उठी। और भारतीय जनता पार्टी ने केंद्र सहित। एक-एक करके। देश के 21 राज्यों में अपनी सरकार बनायीं। अब एक बार फिर भाजपा “मोदी है तो मुमकिन है” और “फिर एक बार मोदी सरकार” जैसे नारों के साथ सरकार बनाने को तैयार है। और जनता के जोश को देखते हुए तो यही लग रहा है। इस आर भी मोदी सरकार ही देश में आने वाली है, और पहले से ज़्यादा बहुलत के साथ। पहले से अधिक सीटों को लेकर।

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