जयपुर। जम्मू कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ जवानों के काफिले पर हुए आतंकी हमले में देश के 42 जवान शहीद हो गए। इन 42 जवानों में से पांच शहीद जवान राजस्थान से थे। गमगीन माहौल के बीच शहीदों के पार्थिव शरीर अब उनके गांव पहुंचने लगे हैं। देश में हर तरफ हताशा का मौहाल है, हर आंख नम हैं तथा हर कोई दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग कर रहा है। वैसे तो शहादत छोटी या बड़ी नहीं होती लेकिन मेवाड़ के लाल नारायण लाल गुर्जर की संघर्षभरी जीवनी पत्थर दिल को भी पिघला देने वाली है। शहीद गुर्जर के शहादत की खबर जैसे ही उनके गांव पहुंची समूचे गांव में शोक की लहर दौड़ पड़ी।

बचपन में मां-बाप को खोया

शहीद नारायण लाल गुर्जर उन बदनसीब बच्चों में से एक थे, जिन पर से छोटी सी उम्र में ही मां-बाप का साया उठ गया। गांव वालों ने बताया कि नारायण जब 6 माह के थे तब उनके पिताजी की मृत्यु हो गई। वहीं 5 वर्ष की उम्र में विधाता ने नारायण से मां की ममता को भी अलग कर दिया। एक संघर्षमयी जीवन के बीच नारायण ने स्कूली शिक्षा ग्रहण की। लेकिन जब आगे की पढ़ाई के लिए पैसा नहीं बचा तो मार्बल का काम भी शुरू कर दिया।

जिंदा रखा देशसेवा का जज्बा

इन सभी संघर्षों के बीच नारायण में देशसेवा की भावना पनप उठी। उन्होंने दौड़-भाग कर खुद को सेना के लिए तैयार किया तथा आर्मी की नौकरी ज्वॉइन कर ली। उनके परिजनों ने बताया कि नारायण हाल ही में जब घर आए थे तो अपने बच्चों को भी सुबह-सुबह घुमाने बाहर ले गए। वे अक्सर अपने बच्चों से देशप्रेम की बातें ही किया करते थे। नारायण 7 दिन की छुट्टियां पूरी कर मंगलवार को ही ड्यूटी पर लौटे थे। लेकिन, उस समय किसी सोचा भी नहीं होगा कि आज हंसते-खेलते घर से विदा लेने वाले नारायण अब तिरंगे में लिपटकर ही वापस आएंगे।

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