जयपुर। प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के लिए साल 2020 काफी उथल-पुथल भरा और कई चुनौतीपूर्ण रहा। कांग्रेस पार्टी के सामने सचिन पायलट खेमे की बगावत और फिर सुलह के बाद सियासत में एक ठहराव सा नजर आया। करीब डेढ़ महीने की बाड़ेबंदी के बाद अशोक गहलोत अपनी सरकार बचाने में कामयाब रहे। वैसे गहलोत पॉलिटिकल मैनेजमेंट और अनुभव के लिए जाने जाते है लेकिन उसके सामने सचिन पायलट खेमा भारी नजर आया। ​फिलहाल राजस्थान कांग्रेस में अब सबकुछ ठीक है। लेकिन घरेलू मोर्चे पर उनके सामने लगातार बड़ी चुनौतियां हैं जिनसे उन्हें पार पाना है।

राजनीति के जादूगर सामने ये बड़ी चुनौतियां
अशोक गहलोत के सामने मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल के साथ राजनीतिक नियुक्तियों से सबको संतुष्ट करने की भी चुनौती कम नहीं है। सबसे बड़ा खतरा यह भी है कि ​मंत्रिमंडल विस्तार और राजनीतिक नियुक्तियों के बाद भी क्या वे सब विधायकों को साध पाएंगे। कांग्रेस के रणनीतिकारों का कहना है कि बोर्ड, निगमों और बड़ी समितियों को लाभ के पदों से बाहर करने का कानून बनाकर विधायकों को राजनीतिक नियुक्ति और मंत्री का दर्जा दिया जा सकता है।

100 विधायकों को संतुष्ट करना बड़ी चुनौती
जानकारों के मुताबिक राजनीति के जादूगर अशोक गहलोत के लिए 100 विधायकों को पद देकर संतुष्ट करना बड़ी चुनौती है। विधायक मंत्री या मलाईदार बोर्ड निगम के अध्यक्ष के अलावा बाकी नियुक्तियों से शायद ही संतुष्ट हों। क्योंकि पावर पॉलटिक्स में हर विधायक सत्ता में नाममात्र की नहीं पावरफुल भागीदारी के बिना संतुष्ट नहीं होगा। अशोक गहलोत के सामने समर्थक विधायकों को जोड़कर रखने के साथ जनता में पर्सेप्शन सुधारने की भी चुनौती रहेगी। राजनीतिक प्रेक्षक सरकार और संगठन को लेकर जनता के बीच नरेटिव बदलने की आवश्यकता बता रहे हैं।

डिजास्टर मैनेजमेंट में महारत, लेकिन नहीं मिला फायदा
डिजास्टर मैनेजमेंट में सीएम अशोक गहलोत को महारत हासिल है। कोरोना मैनेजमेंट को गहलोत एक मॉडल के रूप में पेश करने का प्रयास कर रहे हैं। गहलोत के पहले कार्यकाल में प्रदेश में पड़े भयंकर अकाल के समय किए गए काम और उस समय के अकाल प्रबंधन को लेकर आज भी सियासी और प्रशासनिक हलकों में चर्चा होती है। डिजास्टर मैनेजमेंट की महारत के बावजूद इसका दूसरा पहलू यह भी है कि गहलोत को इसका राजनीतिक रूप से फायदा नहीं मिल पाता। पिछले कार्यकाल में मुफ्त दवा और मुफ्त जांच जैसी योजनाओं के बावजूद कांग्रेस 2013 का विधानसभा चुनाव ऐतिहासिक रूप से हारी। पार्टी महज 21 सीटों पर सिमट कर रह गई।