गुलाम भारत के पहले स्वतंत्रता सेनानी मंगल पाण्डेय की आज जयंती

आजादी के बाद, 5 अक्टूबर, 1984 को भारत सरकार ने मंगल पाण्डेय के सम्मान में एक पोस्टेज स्टाम्प जारी किया जिसपर उनकी फोटो अंकित थी।

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मंगल पाण्डेय- भारत के पहले स्वतंत्रता सेनानी

परतंत्र भारत के पहले क्रांतिकारी कहे जाने वाले मंगल पाण्डेय की आज 191वीं जयंती है। मंगल पाण्डेय देश के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी के रूप में विख्यात हैं। सन् 1857 में उनके द्वारा शुरू किया गया अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह समूचे देश में आग की तरह फैल गया। ‘कमल और रोटी’ की इस आग को अंग्रेजों ने बुझाने का भरसक प्रयास किया लेकिन देश के हर नागरिक के मन में यह आग हवा पकड़ चुकी थी और धधकते हुए शोला बन गई थी। इसी का नतीजा है कि 15 अगस्त, 1947 को देश में पहला स्वतंत्रता का तिरंगा लहराया।


बात करें मंगल पाण्डेय की तो वह पहले ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के एक सिपाही थे जो आगे चलकर सन् 1857 की क्रांति के अग्रदूत बने। मंगल पाण्डेय का जन्म 19 जुलाई, 1827 को उत्तर प्रदेश के बल्लिया जिले के नगवा गांव में हुआ था। उन्होंने 1849 में ईस्ट इंडिया कंपनी की आर्मी ज्वॉइन कर ली। वह बंगाल की एक सेना टुकड़ी में थे। क्रांति के समय बंगाल में एक नई रायफल लायी गई जिसमें कारतूस भरने के लिए रायफल को मुंह से खोलना पड़ता था। इन नयी रायफलों के बारे में अफवाह उड़ गई कि रायफल को चिकना बनाने के लिए इसपर गाय व सुअर की चर्बी का इस्तेमाल हुआ है। सेना की टुकड़ियों में काम करने वाले सभी हिन्दुओं व मुस्लिमों को लगा कि आपस में लड़वाने के लिए अंग्रेजों ने उनके धर्म के साथ खिलवाड़ किया है। बस फिर क्या था। भारतीयों में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की भावना जाग उठी।


9 फरवरी, 1857 को जब इस रायफल का इस्तेमाल करना सिखाया जा रहा था, तब एक अंग्रेजी अफसर ने सभी को इसे मुंह से खोलने को कहा। मंगल पाण्डेय ने ऐसा करने से मना कर दिया। इस पर उन्हें अंग्रेजी अफसर का गुस्से का सामना करना पड़ा और 29 मार्च, 1857 को उनका कोर्टमार्शल कर उनकी वर्दी व रायफल लेने का फैसला हुआ। अब उनसे रायफल छीनी जाने लगी, इसी समय जो हुआ, वह भारतीय स्वतंत्रता क्रांति का सूत्रपात था। मंगल पाण्डेय ने अंग्रेजी अफसर पर हमला बोल दिया और उसपर गोली चला दी। साथ खड़े एक अन्य अफसर को भी उड़ा दिया। सेना ने मंगल पाण्डेय को पकड़ लिया और 6 अप्रैल को उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई।

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पोस्टेज स्टाम्प-5 अक्टूबर, 1984

अंग्रेजी सेना यह बात भली-भांति समझ चुकी थी कि यह बस क्रांति की शुरूआत है। इसी वजह से उन्हें 18 अप्रैल को दी जाने वाली फांसी 10 दिन पहले 8 अप्रैल को ही दे दी गई। उन्होंने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को गले से लगा लिया। यही से देश में 1857 के विद्रोह पनपने लगा। हालांकि वह विफल रहा था। इस घटना के ठीक 90 साल बाद देश को अंग्रेजी कैद से छुटकारा मिला लेकिन इसके सूत्रपात का श्रेय मंगल पाण्डेय को ही जाता है। आजादी के बाद, 5 अक्टूबर, 1984 को भारत सरकार ने मंगल पाण्डेय के सम्मान में एक पोस्टेज स्टाम्प जारी किया जिसमें मंगल पाण्डेय की फोटो अंकित थी।

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