देश के पहले ब्लैड रनर आज गुलाबी नगरी में, कारगिल में गंवा दिया था बायां पैर

साहस व हौसले की उड़ान का नाम है मेजर देवेंद्र पाल सिंह। इनका नाम लिम्बा बुक आॅफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है।

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भारत के पहले ब्लैड रनर-देवेंद्र पाल सिंह

कहते हैं ‘साहस ही हौसले की उड़ान है और यही आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।’ कारगिल युद्ध में अपना बायां पैर गंवाने के बाद भी इस योद्धा ने न हार मानी और न साहस खोया। न जीने की उम्मीद छोड़ी और न ही अपने पैरों पर खड़े होने की जिद। अब वह न केवल दौड़ते हैं बल्कि अपनी डिसएबिलिटी को अपनी ताकत बनाकर औरों को भी आगे बढ़ने का हौसला देते हैं। कुछ ऐसी ही कहानी है देश के पहले ब्लैड रनर मेजर देवेंद्र पाल सिंह की जो आज गुलाबी नगरी जयपुर में हैं। देवेंद्र पाल सिंह भारत के पहले ब्लैड रनर के तौर पर जाने जाते हैं। इनका नाम लिम्बा बुक आॅफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है।

 देवेंद्र पाल सिंह भारत के पहले ब्लैड रनर के तौर पर जाने जाते हैं। इनका नाम लिम्बा बुक आॅफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है।

देवेंद्र पाल सिंह अब एक धावक हैं और सामान्य केटेगिरी में प्रतिभागी के तौर पर भाग लेते हैं। वे अब तक 18 मैराथन में हिस्सा ले चुके हैं। जेके सीमेंट की ओर से आयोजित होने वाली स्वच्छ एबिलिटी रन के लिए देवेंद्र पाल सिंह जयपुर आए हैं। यह दौड़ रविवार को रखी गई है जिसमें 10 किमी. और 3 किमी. की दो रन आयोजित की आएंगी। 10 किमी. रन में बड़े और 3 किमी. दौड़ में बच्चों को भाग लेने दिया जाएगा।

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बात करें इंडिया के पहले ब्लैड रनर की। वह बताते हैं, ‘युद्ध के दौरान जब मेरे सामने 1.5 मीटर की दूरी पर एक मोर्टार शेल गिरा तो मैं गंभीर घायल हो गया। अस्पताल में शुरुआती जांच में तो डॉक्टर्स ने मृत घोषित कर दिया था लेकिन बाद में एक पैर काटकर जान बचाई। करीब एक साल अस्पताल में रहा और बैशाखी के सहारे चलना शुरु किया। बाद में कृत्रिम पैर लगवा लिए। लेकिन देवेंद्र के पास अपंगता को सिरे से नकारते हुए कभी न रुकने का हौसला था। उन्होंने पता किया कि दक्षिण अफ्रीका में कृत्रिम पैर लगाए जाते हैं जो दौड़ने के लिहाज से बेहतर होते हैं। बस फिर क्या था। यहीं से उन्होंने अपनी दौड़ को अपनी जिंदगी बना लिया। अब वह खुद के साथ औरों को भी निशक्तता पर जीत हासिल करने में मदद करते हैं।

देवेंद्र पाल सिंह (44) का कहना है कि वह उन पैराथलीटों को सशक्त बनाने के लिए काम करना चाहते हैं, जो शीर्ष स्तर पर पदक के इच्छुक हैं। उन्होंने अपना एक एनजीओ- द चैलेंजिंग वन्स (टीसीओ) भी शुरू किया है। अब तक टीसीओ ने 1,400 सदस्यों के परिवार में से 400 विशेष रूप से सक्षम व्यक्तियों में आत्मविश्वास बढ़ाने का काम किया है और हर दिन इसके सदस्यों की संख्या बढ़ रही है।

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