सत्य की राह पर अडिग रहने की सीख देती है हजरत इमाम हुसैन की शहादत

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आज मोहर्रम है। मोहर्रम के महीने से इस्लाम का नया साल शुरू होता है। यह महीना हमें पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की कर्बला में दी गई शहादत की याद दिलाता है। मुहर्रम का महीना इस्‍लामी साल का पहला महीना होता है। इसे हिजरी भी कहा जाता है। हिजरी सन् की शुरुआत इसी महीने से होती है। यही नहीं इस्लाम के चार पवित्र महीनों में इस महीने को भी शामिल किया जाता है। मुहर्रम कोई त्‍योहार नहीं बल्‍कि यह वह दिन है जो अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है।

हक एवं ईमान की राह पर चलते हुए दी गई हजरत इमाम हुसैन की शहादत हमें किसी भी परिस्थिति में सच का साथ नहीं छोड़ने की प्रेरणा देती है। इस मुबारक महीने में हम सभी को संकल्प लेना चाहिए कि हम समाज में भाईचारा तथा समरसता कायम करने में अपना योगदान देंगे तथा अपने मुल्क को नई ऊंचाईयों पर ले जाने में मददगार बनेंगे। – मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे

कब है मुहर्रम

इस्‍लामी और ग्रेगोरियन कैलेंडर की तारीखें आपस में मेल न खाने से हर साल मुहर्रम की तारीख अलग-अलग होती है। इस बार मुहर्रम का महीना 11 सितंबर से 9 अक्‍टूबर तक है। इस्‍लामी कैलेंडर चंद्रमा पर आधारित है जबकि ग्रेगोरियन कैलेंडर में तारीखें सूर्य के उदय और अस्त होने के आधार पर तय होती हैं।

मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन ने ईमान को बचाने के लिए अपना बलिदान दिया। इसी की याद में मोहर्रम मनाया जाता है। – कैलाश मेघवाल, विधानसभा अध्यक्ष

क्‍यों मनाया जाता है मुहर्रम

इस्‍लामी मान्‍यताओं के अनुसार इराक में यजीद नाम का जालिम बादशाह इंसानियत का दुश्मन था। यजीद खुद को खलीफा मानता था, लेकिन अल्‍लाह पर उसका कोई विश्‍वास नहीं था। वह चाहता था कि हजरत इमाम हुसैन उसके खेमे में शामिल हो जाएं लेकिन हुसैन को यह मंजूर नहीं था और उन्‍होंने यजीद के विरुद्ध जंग का ऐलान कर दिया। पैगंबर-ए इस्‍लाम हजरत मोहम्‍मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन को कर्बला में परिवार और दोस्तों के साथ शहीद कर दिया गया। जिस महीने हुसैन और उनके परिवार को शहीद किया गया था, वह मुहर्रम का ही महीना था।

मुहर्रम का महत्‍व

मुहर्रम मातम मनाने और धर्म की रक्षा करने वाले हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद करने का दिन है. मुहर्रम के महीने में मुस्लिम समुदाय के लोग शोक मनाते हैं और अपनी हर खुशी का त्‍याग कर देते हैं। मान्‍यताओं के अनुसार बादशाह यजीद ने अपनी सत्ता कायम करने के लिए हुसैन और उनके परिवार वालों पर जुल्‍म किया और मुहर्रम को उन्‍हें बेदर्दी से मौत के घाट उतार दिया। हुसैन का मकसद खुद को मिटाकर भी इस्‍लाम और इंसानियत को जिंदा रखना था। यह धर्म युद्ध इतिहास के पन्‍नों पर हमेशा-हमेशा के लिए दर्ज हो गया।

कैसे मनाया जाता है मुहर्रम

मोहर्रम खुशियों का त्‍योहार नहीं बल्‍कि मातम और आंसू बहाने का महीना है। मुहर्रम के दिन शिया समुदाय के लोग काले कपड़े पहनकर हुसैन और उनके परिवार की शहादत को याद करते हैं और सड़कों पर जुलूस निकालकर मातम मनाया जाता है। मुहर्रम की नौ और 10 तारीख को मुस्लिम रोजे रखते हैं और मस्जिदों-घरों में इबादत की जाती है। वहीं सुन्‍नी समुदाय के लोग मुहर्रम के महीने में 10 दिन तक रोजे रखते हैं। माना जाता है कि मुहर्रम के एक रोजे का सबाब 30 रोजों के बराबर मिलता है।

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