
दशहरे पर जब रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले आग की लपटों में समा जाते हैं, तब मैदान में बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाता है। लेकिन इन विशाल पुतलों को आकार देने वाले हाथ एक और कहानी कहते हैं-साझी संस्कृति और हिंदू-मुस्लिम एकता की।
राजस्थान के अलग-अलग शहरों में मुस्लिम कारीगर पीढ़ियों से दशहरे की इस परंपरा को जीवंत बनाए हुए हैं। बांस, कागज, कपड़े और रंगों से तैयार होने वाले ये पुतले केवल कारीगरी का नमूना नहीं, बल्कि आपसी विश्वास और सांस्कृतिक साझेदारी के प्रतीक भी हैं। बीकानेर और अजमेर में पांचवीं पीढ़ी, श्रीगंगानगर में चौथी पीढ़ी, जबकि अनूपगढ़ और भीलवाड़ा में तीन पीढ़ियों से यह हुनर आगे बढ़ रहा है।
उदयपुर में एक मुस्लिम परिवार चार दशक से पुतले बना रहा है। पाली में निजाकत अली अपने दादा और पिता की विरासत संभाल रहे हैं, वहीं अलवर में इस बार आगरा के जाफर अली की टीम को यह जिम्मेदारी मिली है।




