पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों पर पूरे देश की निगाहें टिकी थीं. बंगाल में पहली बार ‘कमल’ खिला है. बीजेपी ने ना सिर्फ यहां जीतने में कामयाब रही, बल्कि टीएमसी के मुकाबले दोगुनी सीट हासिल की. बीजेपी की इस जीत में पर्दे के पीछे के भी 2 नायक हैं- सुनील बंसल और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव. टीएमसी से मुकाबले के लिए हिंदी पट्टी वाले इन नेताओं को खास जिम्मेदारी दी गई थी. दोनों नेताओं ने मंडल स्तर पर जाकर रणनीति बनाने के साथ अंदरुनी मतभेद सुलझाने का भी काम किया. बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल से लेकर वोटरों का दिल जीतने तक, इस जोड़ी ने जमीन पर बखूबी काम किया.

 

बीजेपी की जीत के ‘आर्किटेक्ट’ भूपेंद्र यादव

भाजपा की पूरी रणनीति के केंद्रीय स्तंभ भूपेंद्र यादव रहे. चुनाव प्रभारी के तौर पर उन्होंने बूथ मैनेजमेंट से लेकर उम्मीदवार चयन तक हर स्तर पर हस्तक्षेप किया. यह उछाल सीधे किसी एक चेहरे का नहीं, बल्कि यादव की सिस्टमेटिक स्ट्रेटेजी का परिणाम माना जा रहा है. बंगाल के करीब 40 हजार बूथों पर “पन्ना प्रमुख” मॉडल लागू कर भाजपा ने वोट शेयर में सुधार किया. कई सीटों पर इस माइक्रो मैनेजमेंट का बड़ा फायदा दिखा.

सुनील बंसल की चप्पे-चप्पे पर थी नजर

इस रणनीति को जमीनी स्तर पर लागू करने में सुनील बंसल की भूमिका साइलेंट गेम चेंजर की रही. हजारों छोटी बैठकों, स्ट्रीट मीटिंग्स और बूथ-स्तरीय मैनेजमेंट के जरिए उन्होंने चुनाव को माइक्रो लेवल तक पहुंचाया. बंगाल के करीब 40 हजार बूथों पर “पन्ना प्रमुख” मॉडल लागू कर भाजपा ने वोट शेयर में सुधार किया. जोनल कमांड में राजस्थान के कैलाश चौधरी की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही.

 

बूथ से बैलेट तक: कैसे बदला पूरा खेल?

बीजेपी का यह चुनाव को सिर्फ रैली और नारों तक सीमित नहीं था, बल्कि डेटा, ग्राउंड कनेक्ट और संगठन के कॉम्बिनेशन पर काम किया. हर बूथ पर एक्टिव नेटवर्क, लोकल मुद्दों पर टारगेटेड कैंपेन, लगातार फीडबैक और कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी और जवाबदेही भी बंसल-यादव की जोड़ी के कंधों पर थी.