
टीएमसी और शिवसेना यूबीटी में टूट से लोकसभा में एनडीए मजबूत स्थिति में पहुंच गई है. इस बीच 20 जुलाई से मानसून सत्र शुरू होने जा रहा है. ऐसे में यह जानना जरूरी हो गया है कि संसद के दोनों सदनों में एनडीए का कुनबा कहां तक पहुंचा है. संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत से वह कितना दूर है.
पिछले दिनों महिला आरक्षण और परिसीमन के मसले पर संसद में मात खा चुकी सरकार अब दो-तिहाई बहुमत के जुगाड़ में लगी है. ये संख्या बल संविधान संशोधन विधेयकों को पास करवाने के लिए जरूरी है. तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना यूबीटी में हालिया टूट के बाद केंद्र की सत्तारूढ़ एनडीए सरकार पहले की तुलना में संख्या बल के नजरिये से और मजबूत हो गई है. हालांकि, आंकड़े बताते हैं कि बीजेपी और उसके सहयोगी अभी भी उस जादुई संख्या से कुछ दूर हैं, जो किसी बड़े संवैधानिक संशोधन को पारित कराने के लिए जरूरी होती है.
आने वाले मानसून सत्र में सरकार परिसीमन, महिला आरक्षण कानून को लागू करने से जुड़े विधेयक और संविधान संशोधन के अन्य प्रस्ताव ला सकती है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या एनडीए संसद में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटा पाएगा? माना जा रहा है कि 20 जुलाई से संसद के दोनों सदनों का मानसून सत्र शुरू हो सकता है.
संविधान संशोधन के लिए कितने वोट जरूरी?
संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को संसद के दोनों सदनों में पास करवाने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत पड़ेगी. मौजूदा समय में लोकसभा की 540 सीटें भरी हुई हैं. यदि सभी सांसद मतदान करते हैं तो संविधान संशोधन के लिए 360 वोटों की जरूरत होगी. अप्रैल 2026 में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पर मतदान के दौरान 528 सांसदों ने वोट डाला था. इनमें 298 सांसदों ने सरकार के पक्ष में और 230 ने विरोध में मतदान किया था. 11 सांसद अनुपस्थित रहे थे. उस समय एनडीए के अपने 293 वोट थे, जबकि पांच अतिरिक्त सांसदों ने भी सरकार का समर्थन किया था. एनडीए के भीतर सबसे बड़ा योगदान बीजेपी का था, जिसके पास 240 सांसद हैं. इसके अलावा तेलुगू देशम पार्टी (16), जदयू (12), एकनाथ शिंदे की शिवसेना (7), लोक जनशक्ति पार्टी (5) तथा अन्य सहयोगी दलों के सांसद शामिल थे.




