राजस्थान सदियों से जल संकट, सूखा और असमान वर्षा की चुनौती से जूझता रहा है. पश्चिमी और पूर्वी राजस्थान के बीच जल उपलब्धता की विषमता ने न केवल कृषि और उद्योग को प्रभावित किया, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन स्तर पर भी असर डाला. ऐसे समय में “राम जल सेतु लिंक परियोजना” के अंतर्गत संशोधित पार्वती–कालीसिंध–चंबल लिंक परियोजना राजस्थान के जल भविष्य को पुनर्परिभाषित करने वाला ऐतिहासिक अभियान बनकर उभर रही है. निरंतर मॉनिटरिंग और केंद्र सरकार के साथ सक्रिय समन्वय के कारण यह परियोजना अब तेजी से धरातल पर आकार ले रही है. गंगा दशहरे के पावन अवसर पर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा द्वारा 25 मई को टोंक जिले के बीसलपुर बांध पर “वंदे गंगा जल संरक्षण जन अभियान” की शुरुआत करना इस परियोजना को आमजन से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण कदम है.

महत्वाकांक्षी ERCP योजना को गति देने के लिए केंद्र सरकार, राजस्थान सरकार और मध्यप्रदेश सरकार के बीच दिसंबर 2024 में महत्वपूर्ण समझौता हुआ.

यह परियोजना मूल रूप से पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ईआरसीपी) के विस्तारित और एकीकृत स्वरूप के रूप में विकसित की गई है. इसका उद्देश्य कूनो, पार्वती और कालीसिंध नदियों के अतिरिक्त जल को बनास, बाणगंगा, गंभीरी, रूपारेल और साबी नदी बेसिनों तक पहुंचाना है, ताकि राज्य की लगभग 40 प्रतिशत आबादी को पेयजल उपलब्ध कराया जा सके. इसके साथ ही लगभग 4 लाख 83 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा विकसित होगी और औद्योगिक क्षेत्रों को भी जल उपलब्ध कराया जाएगा.

परियोजना की कुल अनुमानित लागत लगभग 91 हजार करोड़ रुपये है, जिसमें भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास की बड़ी राशि भी शामिल है. इस महत्वाकांक्षी योजना को गति देने के लिए केंद्र सरकार, राजस्थान सरकार और मध्यप्रदेश सरकार के बीच दिसंबर 2024 में महत्वपूर्ण समझौता हुआ. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में हुए इस समझौते ने परियोजना को राष्ट्रीय प्राथमिकता के स्तर पर पहुंचा दिया.

 

मुख्यमंत्री ने इस परियोजना को जनकल्याण और भविष्य की जल सुरक्षा से जोड़ते हुए लगातार समीक्षा बैठकें कीं, वित्तीय स्वीकृतियों को गति दी और केंद्र सरकार से समन्वय स्थापित कर परियोजना के अटके हुए पहलुओं को आगे बढ़ाया. यही कारण है कि जो योजना वर्षों तक केवल चर्चा में थी, वह अब बड़े पैमाने पर निर्माण कार्यों के रूप में दिखाई देने लगी है

 

परियोजना से राज्य के 17 जिलों झालावाड़, कोटा, बारां, बूंदी, दौसा, अलवर, भरतपुर, करौली, डीग, अजमेर, टोंक, सवाई माधोपुर, जयपुर, ब्यावर, कोटपूतली-बहरोड़, धौलपुर और खैरथल-तिजारा को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा. इन जिलों में पेयजल उपलब्धता सुधरेगी, सिंचाई क्षेत्र बढ़ेगा और औद्योगिक विकास को नई गति मिलेगी.

 

परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसका बहुस्तरीय जल प्रबंधन ढांचा है. बारां जिले में रामगढ़ बैराज और महलपुर बैराज का निर्माण प्रगति पर है, जहां एकत्रित जल को नवनेरा बैराज तक पहुंचाया जाएगा. नवनेरा बैराज का निर्माण कार्य पूर्ण हो चुका है. इसके बाद इस जल को पंप हाउस और चंबल एक्वाडक्ट के माध्यम से आगे विभिन्न बांधों और जलाशयों तक पहुंचाया जाएगा.

 

 

ईसरदा बांध का निर्माण कार्य भी पूर्ण हो चुका है और इसमें इस वर्ष जल भराव किया गया है. लगभग 1038 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित यह बांध परियोजना की प्रमुख कड़ी माना जा रहा है. वहीं नवनेरा बैराज पर लगभग 1117 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं.

 

परियोजना का तकनीकी रूप से सबसे चुनौतीपूर्ण और गौरवपूर्ण भाग चंबल एक्वाडक्ट है. इसका निर्माण बूंदी जिले के गुहाटा गांव के पास हो रहा है. यह भारत का सबसे बड़ा एक्वाडक्ट है. इसकी लंबाई लगभग 2280 मीटर तथा क्षमता 250 क्यूमेक्स है. इसके निर्माण में 5060 पाइल्स और 450 पिलर्स का उपयोग किया जा रहा है. वर्तमान में हजारों पाइल्स का कार्य पूर्ण हो चुका है और प्रतिदिन बड़े स्तर पर कंक्रीटिंग कार्य जारी है.