मां के साथ हारने की खुशी और जीवन के पदक

जब उनसे पूछा गया कि उन्हें सबसे ज्यादा खुशी कब मिली-वर्ल्ड चैंपियनशिप जीतने पर या नागरिक सम्मान मिलने पर? तो आनंद ने बड़ी सादगी से जवाब दिया. उन्होंने कहा कि खुशियों की रैंकिंग नहीं की जा सकती. उन्होंने एक बेहद भावुक बात साझा करते हुए कहा कि मैं आज भी अपनी मां के साथ ताश  खेलता हूं और अक्सर उनसे हार जाता हूं. मुझे उनके साथ खेलकर हारना पसंद है क्योंकि वहां हारना मुझे खुश करता है.

याददाश्त के लिए कलम उठाना जरूरी

उन्होंने AI के बढ़ते कदमों और हर क्षेत्र में इसकी पहुंच पर जवाब देते हुए इसे डिपेंडेंट गैजेट्स का नाम दिया. उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल दौर में हर लोग हर छोटे काम के लिए गैजेट्स पर निर्भर हैं. जो हमेशा प्रभावी नहीं रहती. आनंद ने कहा कि कोई गैजेट आपकी बातों को रिकॉर्ड कर सकता है या टास्क याद दिला सकता है, लेकिन हमारी याददाश्त एक अलग तरह से काम करती है. इसलिए इनपर निर्भर रहने की बजाय हम अपनी जरूरी चीजें हाथ से लिखें. क्योंकि लिखने से दिमाग उसे बेहतर तरीके से सहेजने में मदद करता है.

प्रयोग करना बेहतर होता है

इसके बाद गैजेट्स चर्चा को दूर छोड़ते हुए वह अपने पसंदीदा विषय शतरंज की दुनिया से जुड़े किस्से और अपने अनुभवों को शेयर किया. उन्होंने कहा कि हारने के बाद गुस्सा आना स्वाभाविक है. कई बार ऐसी स्थिति आती है कि आप अपने प्रतिद्वंदी को नापसंद करने लगते हैं. लेकिन शतरंज का असली मास्टर वही है जो इन भावनाओं पर काबू पा ले और अगले मूव पर ध्यान दे. इसी बीच उन्होंने उस पल को भी याद किया जब आनंद ने 2007 के  ग्रैड स्लैम को जीतते हुई की थी. जिसने उन्हें यह भी सिखाया की प्रयोग करना बेहतर होता है.