जब गहलोत-पायलट दो हैं, तो फ़ैसलें एक कैसे हो सकते हैं, दो से भली तो एक ही ठीक थीं

माननीय मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जी कुर्सी मिलते ही अपने उन अरमानों को फिर से ज़िंदा करने में जुट गए हैं, जो 2013 में हाथ से सत्ता चले जाने के बाद उनके दिल के किसी कोने में दफ़्न हो गए थे। तभी तो सबसे पहले उन योजनाओं पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, जो उन्होंने अपने समय में शुरू की थीं। क्योंकि नयी योजनाएं लाने के लिए तो उन्हें उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट की सलाह लेनी पड़ेगी…! और एक 40 साल का राजनीतिक अनुभवी नेता एक ऐसे नए नेता की सलाह कैसे ले सकता है, जिसे राजनीति के अखाड़े में आये हुए अभी सिर्फ़ 14 साल ही हुए हैं।

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच चल रही खींचतान की वजह से ही तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को राजस्थान के सारे फैसले दिल्ली में बैठ कर ख़ुद करने पड़ रहे हैं। फिर वो मुख्यमंत्री पद, उप-मुख्यमंत्री पद या अन्य मंत्रियों के नाम की घोषणा हो या फिर सभी को विभागों का बंटवारा हो। सबकुछ राहुल बाबा के सहारे पर हो रहा है। लेकिन जैसा हम सोच रहे थे, गहलोत जी ने वित्तमंत्रालय और गृहमंत्रालय दोनों को अपनी मुट्ठी में भींच कर रखा है, जबकि पायलट के हाथों में महत्वपूर्ण लोक निर्माण कार्य, ग्रामीण विकास और पंचायती राज विभाग आया। ऐसे में पायलट के हाथ में भी गहलोत के बराबर ही पॉवर हैं। मंत्रीमंडल के कुछ मंत्री पुराने हैं, लेकिन उनसे ज्यादा ऐसे मंत्री हैं, जो पहली बार अपने राजनीतिक व्यवसाय की शुरुआत कर रहे हैं। ऐसे में गहलोत जी को सरकार चलाने में काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि हर बार वे चाहते हैं कि उनकी सरकार ज़िम्मेदार और जवाबदार हो लेकिन फिर बीच में ही मुद्दे से कहीं भटक जाते हैं। ऐसे में जनता के मन में यही सवाल उठता है कि क्या गहलोत राज्य को एक नई दिशा देने में सक्षम होंगे या वह केवल उन मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करेंगे जो पिछली सरकार में भी उनके लिए आसान थे?

Ashok Gahalot, Sachin Pilot and Vasundhara Raje

अशोक गहलोत, सचिन पायलट और वसुंधरा राजे

इसीलिए सबसे पहले उन्होंने भाजपा सरकार की योजनाओं के नाम बदलने और उन्हें अपना नाम देने के फ़ैसले लिए हैं या पूर्व में अपनी चलायी गयी योजनाओं को फिर से ज़िंदा करने के निर्णय। अपनी पहली ही कैबिनेट बैठक के दौरान, सीएम ने जयपुर में पत्रकारिता विश्वविद्यालय को दोबारा शुरू करने फैसला किया, जिसे वसुंधरा राजे सरकार ने राजस्थान विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में शामिल कर दिया था। इसके अलावा, उन्होंने महापौर पदों के लिए भी प्रत्यक्ष चुनाव प्रक्रिया को लागू कर दिया है। क्योंकि कार्यकालों में कांग्रेस की सरकार रहते हुए भी भाजपा के पार्षदों ने कांग्रेस के महापौर का विरोध किया क्योंकि कांग्रेस के महापौरों ने बोर्डों का नेतृत्व किया, जिनके पास भाजपा का बहुमत था।

गहलोत ने जी ने पंचायती राज और स्थानीय निकाय चुनावों के लिए उम्मीदवारों की न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता को ख़त्म करके सबको चौंका दिया है। ऐसा करके वो अशिक्षित वोट बैंक को तो साध सकते हैं, लेकिन पढ़े-लिखे और समझदार वर्ग के वोट अब कांग्रेस के खाते से कट जायेंगे। क्योंकि भाजपा ने जब ये नियम लागू किया था, तो जनता को लगा कि शायद यही सिलसिला जारी रहा तो विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भी शैक्षणिक योग्यता जरूरी कर दी जाएगी और जनता को शिक्षित, समझदार और होशियार जन प्रतिनिधि मिलेंगे जो देश-प्रदेश का भला करेंगे। लेकिन यहां तो मुख्यमंत्री जी ने फिर से अंगूठा छापों को सरकार चलने की आज्ञा दे दी है।

उन्होंने अपने फैसलों को सही साबित करने के लिए अपने पसंद के अधिकारीयों को भी अपने हिसाब से रख लिया है। उदाहरण के लिए समित शर्मा जी, जिन्होंने अस्पतालों में मुफ्त दवाई बांटने कि योजना का सुझाव दिया था। मगर भाजपा सरकार ने कांग्रेस से एक कदम आगे निकलते हुए आम जनता के लिए दवाइयों के साथ-साथ 30 हज़ार से 3 लाख़ तक के मुफ़्त इलाज की सुविधा दी थी। कांग्रेस सरकार में बाड़मेर रिफाइनरी पर भी एक बार फिर से काम अटक सकता है, क्योंकि किसान कर्ज़ माफ़ी से राज्य के सरकारी ख़जाने पर पहले ही बड़ा भार पड़ने वाला है। एक बात और गहलोत सरकार ने जयपुर मेट्रो के बारे में कुछ नहीं कहा, जिसका 2013 विधानसभा चुनावों में जनता को लुभाने के लिए अशोक जी द्वारा ही उद्घाटन किया गया था। जो पूरी तरह से असफल रहा क्योंकि एक तो कम दूरी के लिए शुरू की गयी और फिर घाटे की भरपाई करने के लिए मेट्रो निगम ने किराये में बढ़ोतरी कर दी। इसकी बजाय इसे जयपुर के व्यस्ततम मार्गों जैसे टोंक रोड और जेएलएन मार्ग पर चलाया जाता तो ज़्यादा जनता और निगम दोनों को लाभ मिलता। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ ऊपर से मेट्रो अधिकारी पार्किंग और यातायात के मुद्दों की बुरी तरह से अनदेखी भी करते हैं।

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