देश के लिए सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाले बलिदानियों की कहानी है, ”कारगिल विजय दिवस”

आज ही से ठीक 18 साल पहले 26 जुलाई 1999 के दिन भारतीय सैनिकों ने अपने अदम्य साहस और शौर्य के बल पर हिमालय की गोद में बसे कारगिल की दुर्गम ऊंचाइयों पर दुश्मनों से फ़तेह हासिल की थी। तभी से हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। पाकिस्तानी सेना और आतंकवादियों ने छद्म कूटनीति का सहारा लेकर लद्दाख की इस पर्वत छोटी को हड़प लिया था। ढाई महीने तक चला यह युद्ध घुसपैठियों पर भारत की जीत के साथ पूरा हुआ था। 8 मई 1999 को शुरू हुई कारगिल जंग 26 जुलाई 1999 को पाकिस्तान की हार के साथ खत्म हुई थी।

ऑपरेशन विजय की सफलता की कहानी है विजय दिवस:

पाकिस्तानी सेना और घुसपैठियों को पूरी तरह से खदेड़ने के लिए भारत सरकार ने ऑपरेशन विजय का संचालन किया था। देश के केंद्र में उस समय अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार थी। सरकार ने सेना को खुलकर लड़ने के लिए फ्री-हैण्ड दे दिया था। अद्भुत पराक्रम और वीरता से भारतीय सेना ने पाकिस्तानी घुसपैठियों को हराकर अपनी विजयी कहानी लिखी थी।

शहीद सौरभ कालिया, कैप्टन विजयंत थापर, कैप्टन विक्रम बत्रा, मनोज कुमार पांडेय, कैप्टन अनुज नायर और भी सैंकड़ों भारतपुत्रों ने इस विजय को हासिल करने में अपने प्राणों का बलिदान कर दिया था। इस युद्ध में अनेक ऐसे भारतीय वीर भी रहे जो पूरी तरह घायल होने के बाद भी दुश्मन पर गोलियां बरसाते रहे।

सैंकड़ों शहीदी से लिखी हुई है यह कहानी:

कारगिल के युद्ध में भारत के 527 से अधिक वीर सैनिकों ने अपना बलिदान दिया। पाकिस्तानी घुसपैठियों और सेना का सामना करते हुए हमारे 1300 से ज़्यादा जवान इस युद्ध में घायल हो गए थे। इनमें कोई 22 वर्ष का था तो कोई इसके आसपास। ये सभी देश के दीवाने अपनी मातृभूमि से अमिट प्यार करते थे। अधिकतर सैनिक 30 वर्ष से कम उम्र के थे। इन शहीदों ने भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परंपरा को आगे बढ़ाया जो हमारे देश के इतिहास में सदियों से चली आ रही है। वतन के लिए उन जांबाज़ों में दीवानगी ऐसी कि राशन मिले न मिले लेकिन एमिनेशन मिलना चाहिए और ब्रैड मिले न मिले लेकिन बुलेट चाहिए की सोच के साथ वो आगे बढ़े थे।

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