राजस्थान की मरु भूमि पर हरियाली का अभियान है मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन

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मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बनअभियान

राजस्थान की भूमि आदिकाल से ही मरुस्थलीय भूमि है जहाँ पर ज्यादातर समय सूखा ही पड़ता है। क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान देश का सबसे बड़ा प्रदेश है। मगर 343 लाख़ हैक्टेयर में से मात्र 168 लाख़ हैक्टेयर भू-भाग ही कृषि लायक है तथा 101 लाख़ हैक्टेयर भूमि बंजर है। एक तो राजस्थान में पहले से ही बारिश कम होती है। इस पर भी दिन पर दिन भूमि का घटता हुआ जल स्तर। बढ़ती हुई जनसंख्या एवं बदलते हुए मौसमी परिवेश की वजह से प्रदेश में जल की उपलब्धता और आवश्यकता में भारी अंतर उत्पन्न हो गया था। समय के साथ-साथ बारिश भी कम होने लगी थी। प्रदेश में जल संकट बढ़ता ही जा रहा था। राज्य में जल संकट को दूर करने के लिए राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने 27 जनवरी 2016 से ‘मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन अभियान’ की शुरुआत की।

अभियान का मुख्य उद्देश्य

अभियान का मुख्य उद्देश्य प्रदेश में होने वाली बरसात के पानी को यथा स्थान संरक्षित कर जन उपयोग में लाना, बारिश के पानी की एक-एक बूंद को सहेजकर गांवों व शहरों को जल आत्मनिर्भर बनाना था। इस अभियान के तहत विभिन्न चरणों में प्रदेश में पारंपरिक जल संरक्षण के तरीकों जैसे तालाब, कुंड, बावड़ियों, टांके आदि का मरम्मत कार्य एवं नई तकनीकों से एनिकट, टांके, मेड़बंदी आदि का निर्माण करवाया गया। इन जल संरचनाओं के निकट पौधारोपण भी किया गया जिनका अगले 5 सालों तक संरक्षण भी इस अभियान में शामिल है।

मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन अभियान के चरण

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प्रथम चरण : –

मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन अभियान का पहला चरण 27 जनवरी 2016 से 30 जून 2016 तक चलाया गया। जिसमे प्रदेश की 295 पंचायत समितियों के 3 हज़ार 529 गांवों में तालाब, कुंड, बावड़ियों, टांके आदि का मरम्मत कार्य एवं नए-नए एनिकट, टांके, मेड़बंदी आदि का निर्माण किया गया है। जल संरचनाओं के आस-पास 26.5 लाख से ज़्यादा पौधारोपण भी किया गया और इन पौधों का अगले 5 सालों तक संरक्षण कार्य भी सरकार द्वारा ही करवाया जा रहा है। अभियान में भू-संरक्षण, पंचायतीराज, मनरेगा, कृषि, उद्यान, वन, जलदाय, जल संसाधन एवं भूजल ग्रहण आदि 9 राजकीय विभागों, सामाजिक धार्मिक समूहों एवं आमजन ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मुख्यमंत्री की दूरदृष्टिता और बारिश के जल की एक-एक बूंद को सहज कर भूमि में समाहित करने की परिकल्पना में अभियान के पहले चरण में 1 हज़ार 593 करोड़ रुपये की लागत से करीब 95 हज़ार 793 निर्माण कार्य पूर्ण किये गए।

द्वितीय चरण : –

मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन अभियान का दूसरा चरण 9 दिसम्बर 2016 से शुरू किया गया। अभियान के दूसरे चरण में 4 हज़ार 213 गांवों व सभी 32 जिलों के 66 शहरों को अभियान में शामिल किया गया। शहरी क्षेत्रों में पहले से निर्मित बावड़ियों, तालाबों, जोहडों आदि की मरम्मत का कार्य किया गया। इस चरण में रूफ़ टॉप वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के अलावा परकोलेशन टेंक भी बनाये गए। इस चरण में 1 हज़ार 637 करोड़ 84 लाख़ रुपये की लागत से सभी चयनित स्थानों पर 1 लाख़ 31 हज़ार 753 जगहों पर जल संरचनाओं में सुधार कार्य करवाए गए। जिनमे 1109 रूफ़ टॉप वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम 222 बावड़ी के अलावा 69 परकोलेशन टेंक भी बनाये गए।

तृतीय चरण : –

मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन अभियान का शुभारम्भ 9 दिसम्बर 2017 से 4 हज़ार 314 गांवों, 9 दिसंबर 2017 से मरुस्थलीय जिलों में, 15 दिसंबर 2017 से अजमेर, अलवर, भीलवाड़ा, एवं शेष जिलों में 20 जनवरी 2018 से किया गया। जिसके तहत ऊपर चयनित सभी गांवों व 162 शहरों में कुल 1 लाख़ 47 हज़ार 650 कार्य पूर्ण किये गए। जिन पर 1 हज़ार 719 करोड़ 56 लाख़ रुपये ख़र्च किये गए। तथा सतत कार्य जारी है।

अभियान की सफलता

मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन अभियान के तहत समस्त प्रदेश में जगह-जगह पर जल संरक्षण की कई संरचनाएं बनाई गई। प्रदेश में 12 हज़ार 56 गांवों सहित सभी शहरों में लगभग 5000 करोड़ रुपये ख़र्च कर कुल 3 लाख़ 75 हज़ार 196 कार्य पूर्ण किये जा चुके हैं। जिसके परिणामस्वरूप प्रदेश में भू-जल स्तर बढ़ा, सतही स्त्रोतों में पानी जमा हुआ , पानी के बहाव से मिट्टी की ऊपरी सतह के बहाव को रोका गया, मिट्टी की नमी में बढ़ोतरी हुई, खेती की पैदावार में वृद्धि हुई तथा निश्चय ही प्रदेश में जल संकट काफी हद तक काम हुआ है। मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन अभियान के तहत भविष्य में राज्य के 21 हज़ार गांवों को लाभान्वित कर जल आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य है। परिणामतः वह दिन दूर नहीं होगा जब राजस्थान की मरू भूमि पर भी आने वाले समय में कभी जल की समस्या नहीं आएगी।

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