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आज महाराणा प्रताप जयंती है। उनकी 478वीं जयंती पर राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे ने उन्हें याद करते हुए श्रद्धापूर्वक नमन किया है। अपने संदेश में उन्होंने कहा है, त्याग, बलिदान, अदम्य साहस और स्वाभिमान के प्रतीक मेवाड़ के महान योद्धा वीर शिरोमणि महाराणा प्रतापजी की जयंती पर उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन।’

महाराणा प्रताप का नाम भारत के इतिहास में उनकी बहादुरी के कारण अमर है। वह अकेले राजपूत राजा रहे जिन्होंने कभी भी मुगल बादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की। उनका जन्म 9 मई, 1540 को राजस्थान के मेवाड़ जिले के कुम्भलगढ़ में सिसोदिया राजवंश में हुआ था। मेवाड़ के राजा महाराणा उदय सिंह और महारानी जयवंता बाई की संतान महाराणा प्रताप की वीरता के कायल राजपूत ही नहीं मुगल साम्राज्य भी था।

बचपन में कीका के नाम से जाने जाने वाले महाराणा प्रताप के बारे में मुगल दरबार के कवि अब्दुर रहमान ने लिखा है, ‘इस दुनिया में सभी चीज खत्म होने वाली है। धन-दौलत खत्म हो जाएंगे लेकिन महान इंसान के गुण हमेशा जिंदा रहेंगे। प्रताप ने धन-दौलत को छोड़ दिया लेकिन अपना सिर कभी नहीं झुकाया। हिंद के सभी राजकुमारों में अकेले उन्होंने अपना सम्मान कायम रखा।’

महाराणा प्रताप ने भी अकबर की अधीनता को स्वीकार नहीं की। उन्होंने कई वर्षों तक मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया और घास की रोटियां भी खाई। सन् 1576 के हल्दीघाटी युद्ध में करीब बीस हजार राजपूतों को साथ लेकर महाराणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के अस्सी हजार की सेना का सामना किया। यह युद्ध केवल एक दिन चला परंतु इसमें सत्रह हजार लोग मारे गए। हालांकि इस युद्ध में न महाराणा प्रताप की हार हुई और न ही अकबर की जीत।

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महाराणा प्रताप के घोड़े का नाम चेतक था, जो काफी तेज दौड़ता था. अपने राजा को बचाने के लिए वह 26 फीट लंबे नाले के ऊपर से कूद गया था। यहां चेतक का एक मंदिर भी बना है जो आज भी हल्दीघाटी में सुरक्षित है। उनकी मृत्यु 29 जनवरी, 1597 में हुई थी। महाराणा प्रताप की तलवार, कवच उदयपुर राज घराने के म्यूजियम में आज भी सुरक्षित रखी हुई है।

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