गुर्जर आरक्षण आन्दोलन
गुर्जर आरक्षण आन्दोलन

स्वतंत्र भारत को और अधिक विकसित व मज़बूत बनाने के लिए। तथा समाज में फैली जातीय बुराइयों की वजह से बढ़ती सामजिक विषमता को दूर करने के लिए। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने भारत का संविधान तो बनाया ही। लेकिन चूंकि वे विधि के बहुत बड़े ज्ञाता भी थे। इसलिए उन्होंने संविधान के साथ-साथ एक नयी व्यवस्था लागू की। जिसे हम आरक्षण व्यवस्था के नाम से जानते हैं। बाबा साहेब के नियमानुसार तो ये आरक्षण व्यवस्था और सामजिक विषमता मात्र 10 सालों के लिए थी। लेकिन राजनीतिक स्वार्थ के कारण कुछ लोगों ने इसे वोट बैंक बना दिया। और आरक्षण को घसीटते-घसीटते आज 70 सालों तक ले आये। जिसका दंश आप और हम आज भी गुर्जर आरक्षण आन्दोलन के रूप में झेल रहे हैं। और इस गुर्जर आरक्षण आन्दोलन के ज़िम्मेदारों में कर्नल किरोड़ी बैंसला एवं सचिन पायलट प्रमुख हैं।

गुर्जर आरक्षण के लिए ना लड़ाई नयी, ना तरीक़ा

गुर्जर आरक्षण आन्दोलन के वर्तमान प्रणेता कर्नल किरोड़ी बैंसला के अनुसार वे पिछले 14 सालों से आरक्षण के लिए लड़ रहे हैं। लेकिन बड़े स्तर पर ये आज से ठीक 11 साल, 8 महीने और 10 दिन पहले, 29 मई, 2007 को जयपुर-आगरा नेशनल हाईवे 21 पर स्थित पाटोली गांव में शुरु हुआ था। जब अपने आप को गुर्जरों का भला करने वाला कहने वाले बड़े लोगों का तो कुछ नहीं बिगड़ा। लेकिन आम गुर्जर लोगों में से 72 युवाओं की मौत हो गयी। जिसमे ग़लती ना मारने वालों की थी, ना ही मरने वालों की। गलती थी तो सिर्फ़ उन लोगों की। जिन्होंने उन्हें आरक्षण का लालच देकर सुनहरे भविष्य के सपने देखने के लिए उकसाया। और उकसाया! उन्हें सार्वजानिक और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के लिए। दस साल पहले गुर्जर ओबीसी में थे।

उसके बाद गुर्जरों को लिए अलग से 5% आरक्षण कैटेगरी, एसबीसी बनायी गयी। जिसके तहत उनको आरक्षण मिला भी। लेकिन सरकार और कोर्ट के कानूनी पचड़ों के बीच ये आरक्षण कहीं अटक कर रह गया। वर्तमान में गुर्जर ओबीसी कैटेगरी के अनुसार रिज़र्वेशन प्राप्त कर रहे हैं। मगर पिछले 10 सालों से ही कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला, गुर्जरों को अलग से स्पष्ट 5% आरक्षण की मांग कर रहे हैं। जिसके लिए ये हर बार या तो सड़कों पर उतर आते हैं। या फिर रेल की पटरियों पर। बात उतरने तक तो ठीक है। लेकिन ये उन्हें नुक़सान भी पहुंचाते हैं। जिससे सरकार का तो कुछ नहीं बिगड़ता। जो नुक़सान होता है, मगर उसकी भरपाई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जनता को भी करनी पड़ती है। और ये सोचने वाली बात है।

बैंसला हो या पायलट सबने अपने स्वार्थ के लिए समाज का इस्तेमाल किया

जब तक समाज सेवा निस्वार्थ भाव से की जाती है, तब तक तो ठीक है। लेकिन जब ये सेवा-भाव एहसान का रूप ले लेती है, तो इंसान का स्वार्थी होना लाज़िम है। बैंसला और पायलट ने सामज को इसी एहसान तले दबाया और कई बार अपने स्वार्थ सिद्ध किये। जब 2007 में पहली बार गुर्जर आरक्षण आन्दोलन हुआ तो, 2009 में कर्नल किरोड़ी सिंह बैसला ने भाजपा से टिकट लेकर टोंक-सवाई माधोपुर की लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और हार गए। वहीं दूसरी तरफ़ सचिन पायलट ने अजमेर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत गए। दोनों के चुनाव की वजह सिर्फ़ और सिर्फ़ जातीय समीकरण थे। इसके आलावा कितने ही नेताओं ने गुर्जर आरक्षण आन्दोलन के नाम पर अपने उल्लू सीधे किये।

  • सभी समझौता वार्ताओं में प्रमुखता से रहे कैप्टन हर प्रसाद वर्तमान में सरपंच है।
  • ओम प्रकाश भड़ाना, 2010 में गुर्जर आरक्षण आन्दोलन से जुड़े और फिर राजनीति में आ गए।
  • 2008 के समझौते में शामिल देवकीनंदन काका को कांग्रेस ने 2013 में राजसमंद से टिकट दिया।
  • रामवीर सिंह बिधूड़ी भी 2008 के सरकारी समझौते में थे। फिर बदरपुर दिल्ली से भाजपा विधायक बने।
  • हरियाणा के सुभाष चौधरी 2008 के समझौता वार्ता में आए और 2009 में पलवल हरियाणा से विधायक बने।
  • सुखबीर सिंह जौनापुरिया 2009 में निर्दलीय चुनाव लड़े, वर्तमान में भाजपा से सवाई माधोपुर के सांसद हैं।
  • आंदोलनकारियों के नेता ब्रहमसिंह एडवोकेट 2007 आरक्षण आंदोलन के तुरंत बाद आरपीएससी के सदस्य बने।
  • राजेंद्र गुर्जर, टोंक देवली उनियारा से 2011 में आरक्षण आंदोलन से प्रमुखता से जुड़े और 2013 में भाजपा से विधायक बने।
  • 2008 के गुर्जर आरक्षण आन्दोलन से जुड़ने के बाद मानसिंह गुर्जर को भाजपा ने गंगापुर सिटी से टिकट दिया जो 2013 में विधायक बने।
  • 2007 व 2008 में कर्नल बैंसला के रिश्तेदार, एमपी कैडर रिटा. आईएएस सरदार सिंह डंगस समझौता वार्ता में आये। जो 2008 में देवनारायण बोर्ड के चेयरमैन बने।

सचिन पायलट ने तो हाल ही में भी लालच दिया था

आरक्षण के नाम पर समाज को झूठी तसल्ली का लालच तो सचिन पाइलट  ने भी दिया था। जब राजस्थान विधानसभा चुनावों से ठीक पहले कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष, वर्तमान उप-मुख्यमंत्री और तत्कालीन विपक्ष पार्टी के नेता पायलट निवाई में एक सामाजिक कार्यक्रम में भाग लेने गए थे। उस वक़्त सचिन पायलट के बोल थे… “समाज का साथ रहा तो मैं अकेला ही कबड्डी खेल जाऊंगा।” साथ ही उन्होंने गुर्जरों को आरक्षण देने की बात भी कही थी। लेकिन अब, जब गुर्जरों ने विकट गुर्जर आरक्षण आन्दोलन करने का एलान कर दिया है, तो सचिन पायलट के मुंह से एक शब्द नहीं निकल रहा हैं। अभी दो-तीन दिन पहले एक प्रेस वार्ता के दौरन गुर्जर आरक्षण आन्दोलन को लेकर सवाल पूछे जाने पर वर्तमान मुख्यमंत्री श्रीमान अशोक गहलोत और उप-मुख्यमंत्री श्री सचिन पायलट एक-दूसरे का मुंह ताकते और आपस में जवाब देने के लिए माइक को एक-दूसरे की ओर खिसकाते हुए नज़र आये। लेकिन गुर्जरों ने भी अब कमर कस ली है। आर-पार की लड़ाई का अल्टीमेटम दे दिया है।

गुर्जर आरक्षण आन्दोलन की चेतावनी, 14 जिलों में हाई अलर्ट जारी

गुर्जर समाज के ढकोसले बाजों, फ़र्जी शुभचिंतकों की ओर से शुक्रवार से गुर्जर आरक्षण आन्दोलन का आह्वान किया गया है। और कांग्रेस सरकार को आज शाम 5 बजे तक का समय दिया गया है। जिसको देखते हुए राजस्थान के 14 जिलों में हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया है। गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के संयोजक कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला ने राजस्थान सरकार को ‘अबकी बार, आखिरी बार’ के नारे के साथ गुर्जर आरक्षण आन्दोलन की चेतावनी दी हुई है। इसलिए सुरक्षा के लिहाज़ से मुख्य सचिव डीबी गुप्ता ने डीजीपी कपिल गर्ग को गुर्जर बाहुल्य क्षेत्रों में विशेष निगरानी रखने के आदेश दिए हैं। और सवाई माधोपुर रेलवे ट्रैक पर विशेष सुरक्षा व्यवस्था करने के लिए कहा है। क्योंकि जब भी आरक्षण की बात आती है, ये लोग सब पहले सड़कों और रेल पटरियों को ही सबसे ज़्यादा क्षतिग्रस्त करते हैं।

और इस बार तो कर्नल बैंसला ने स्पष्ट रूप से कहा है। यदि आज सायं 5 बजे तक उनकी मांगों को पूरा नहीं किया गया तो। प्रदेश का राजधानी जयपुर से ही संपर्क काट दिया जायेगा, पूरी तरह से। उन्होंने टोंक, अजमेर, आगरा, दिल्ली हाइवे जाम करने तथा जयपुर-दिल्ली और जयपुर-सवाई माधोपुर-गंगापुर रेल मार्ग को भी अवरोधित करने की खुली धमकी दे दी है। इसके बाद जयपुर, दौसा, करौली, भरतपुर, धौलपुर, अलवर, टोंक, सवाईमाधोपुर, कोटा, झालावाड़, बूंदी, भीलवाड़ा, अजमेर, राजसमंद जिलों एवं आस-पास के क्षेत्रों में पुलिस को अलर्ट कर दिया गया है। बैंसला ने आर-पार की लड़ाई का हवाला देते हुए समाज से अधिक से अधिक संख्या में गुर्जर आरक्षण आन्दोलन में शामिल होने की अपील की है।

72 लोगों ने जान दे दी, कइयों ने गोली भी खा ली, फिर भी दोनों हाथ ख़ाली

गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के प्रवक्ता हिम्मत सिंह का कहना है, कि युवा वर्ग नाराज है। क्योंकि गुर्जर आरक्षण आन्दोलन में नेता आते तो हैं। लेकिन फ़ायदा उठाकर चले जाते हैं। हम कई लोग वर्षों से काम कर रहे है। लेकिन आज तक किसी पॉलिटिकल पार्टी से नहीं जुड़े। सीधे तौर पर कहना चाहता हूं कि कुछ लोग समाज को नहीं खुद को पनपाना चाहते है। जिसका बेहतर उदाहरण हम ऊपर ही दे चुके हैं। क्योंकि एक बार फिर देश में आम चुनाव सिर पर हैं। लोकसभा चुनाव जो आ रहे हैं।

लेकिन एक बात ये भी है ना कि एक ओर जहां देश का युवा वर्ग चाह रहा है कि आरक्षण व्यवस्था पूर्ण रूप से ख़त्म कर दी जाये। वहीं आज के सामाजिक जीवन में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अरक्षाण लेने के किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। अगर ये आरक्षण व्यवस्था ऐसे ही चलती रही तो एक दिन हमारी सामाजिकता पूर्ण रूप से छिन्न-भिन्न हो जाएगी और सामाजिकता एकता दम तोड़ देगी।

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